Monday, May 17, 2010

बेतुके…… के बेतुके फ़तवे

इन बेतुके फ़तवों पर हंसी भी आती है और अफ़सोस भी होता है कि क्या हो गया है, इन उलेमाओं को... जो अपनी क़ाबलियत का दम्भ भरते हैं... और शरीयत की बिसात पर फ़तवों की चाल चल क़ौम को बरग़ला रहे हैं... लेकिन वो भूल गए है कि आज हर इंसान अपने हक़ के बारे में पूरी जानकारी रखना चाहता है... और जो नहीं भी रखता तो रही सही कसर मीडिया पूरी कर देता है...फ़तवे देने से पहले इन उलेमाओं को शरीअत के साथ पैग़म्बर मोहम्मद (स.अ) की ज़िन्दगी पर भी ग़ौरफ़रमा लेना चाहिए... लेकिन कोई बात नहीं जिन चीज़ों पर ये आलिम ध्यान न दें उन चीज़ों पर हम जैसे लोगों का ध्यान अक्सर चला जाता हैं...तो इन उलेमाओं को ध्यान दिला दिया जाए की पैग़म्बर मोहम्मद की पहली पत्नी ख़तीज़ा भी तिजारत करती थीं (बिजनेस) वो अपने ज़माने की बहुत बड़ी बिजनेस वुमेन थी... अब सवाल ये खड़ा होता है.. की मुस्लिम औरते नौकरियां ही कितनी करती हैं... जो उनपर फ़तवे और धिक्कार का फ़रमान लागू किया जाए... जो करती भी हैं उनको फ़तवों की बेड़िया पहना कर चार दिवारी में क़ैद करने की कोशिश की जा रही है...मुस्लिम समाज वैसे भी पिछड़ा हुआ हैं...और जो महिलाए आगे बढ़ना भी चाहती है तो उनको पीछे खींचा जा रहा है...और सबसे बड़ा सवाल ये है... की जब इस्लाम ने जब औरतों पर इस तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाई है... तो ये उलेमा कौन होते है इन पर अपनी राय क़ायम करने वाले...ग़ौरतलब है कि नौकरियों में मुसलमानों की मौजूदगी पहले ही बेहद कम है… नौकरी में उनका हिस्सा 5 फ़ीसदी से भी कम… मुस्लिम औरतों के लिए नौकरी के मौक़े भी बहुत कम हैं...
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुस्लमनों के लिए कई नेताओं ने आरक्षण की आवाज़ बुलंद की... ऐसे में दारुल उलूम देवबंद के फ़तवे जारी हो रहे हैं... क़ौम की तरक्की से जुड़े इस मसले पर मुस्लिमों के सियासी और मज़हबी नेता भी दायरों से बंधे हैं... देवबंद के ताज़ा फ़तवे ने सीधा सवाल यह खड़ा कर दिया है... कि मौक़ा मिलने पर औरतें नौकरी करें या नहीं... वो मज़हब की रवायतों को तरजीह दें या अपनी तालीम और तरक्क़ी को...
मुस्लिम समुदाय में सिर्फ 25.2 फ़ीसदी औरतें ही कामकाजी हैं... नौकरियों में मुस्लमान की भागीदारी कुछ इस तरह है..... आईएएस 03 फीसदी... आईएफएस 1.8 फीसदी... आईपीएस 04 फीसदी... रेलवे 4.5 फीसदी... अदालतें 7.8 फीसदी... पुलिस 06 फीसदी... स्वास्थ्य 4.4 फीसदी... शिक्षा 6.5 फीसदी.... 14 साल की उम्र के 25 फीसदी मुस्लिम बच्चे स्कूलों से महरूम हैं... ज़ाहिर है की बेहतर नौकरियां दूर की बात हैं... इस सूरते-हाल में ऐसे फ़तवों की क्या अहमियत है...नौकरियों में मुस्लिमों की बेहद कम तादाद का अफ़सोस मज़हबी नेताओं को है... लेकिन औरतों के सवाल पर पुरानी रवायतें उन पर हावी हैं...मुस्लिम महिलाओं के लिए शरीयत के हिसाब से सरकारी या प्राइवेट क्षेत्र में काम करना ग़ैरक़ानूनी है...और किसी परिवार के लिए महिला की कमाई मंज़ूर करना भी हराम है... ये फ़तवा जारी किया गया है...और ऐसे कितने फ़तवे जारी किए जा चुके है... लेकिन क्या कभी इन बेतुके फ़तवों को कोई अमल में लाया... नहीं... लेकिन फ़िर भी ये उलेमा फ़तवे बाज़ी से बाज़ नहीं आ रहे हैं...

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