Monday, June 7, 2010

भोपाल का दर्द... अधूरा इंसाफ़...

नवाबी शान-व-शौक़त को अपने अंदर समाए शहर-ए-भोपाल की वो दर्द भरी काली रात जिसकी आज तक सुबह हुई... मौत से बेख़बर... बेख़ौफ़ होकर 2 दिसंबर की उस रात को जब लोग सुकून से अपने-अपने घरों में सो रहे थे... तब मौत घुटन की शक़्ल में उन की नींदों पर हमेशा के लिए क़ाबिज़ हो गई... लेकिन जो लोग मौत और ज़िन्दगी के बीच की जंग लड़के जीत गए... वो आज तक उस घुटन भरी काली रात को याद करके थर्रा जाते है... भोपाल गैस त्रादसी का जख़्म इतनी आसानी से नही भुलाया जा सकता है... उस वक्त इस हादसे से जो रू-ब-रू हुए उनके दर्द की दास्तान सुन कर हम जैसे भी कांप जाते है जिनका उस वक़्त अस्तित्व ही नहीं था... लेकिन कहते हैं ना इंसाफ़ का एक दिन ज़रूर आता हैं... और शायद भोपाल गैस पीड़ितों के लिए वो दिन आ ही गया...
भोपाल गैस त्रासदी के मामले पर 23 साल तक चली सुनवाई के बाद चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मोहन पी तिवारी ने 8 आरोपियों को दोषी करार दे दिया है... कोर्ट ने इन आरोपियों को धारा 304-ए के तहत लापरवाही का दोषी पाया है... सीबीआई ने इस गैस कांड मामले में यूनियन कार्बाइड कॉपरेरेशन के तत्कालीन चेयरमैन वारेन एंडरसन समेत 12 को आरोपी बनाया है...
23 साल चली सुनवाई आख़िरकार 13 मई 2010 को पूरी हो गई...
मौत का ख़ौफ़नाक मंजर झेल चुके फरियादियों ने इंसाफ के लिए 25 साल इंतजार में गुज़ार दिए... इनके जख्म पर वक़्त की परत चढ़ चुकी है, लेकिन नासूर बना ज़ख़्म आज भी जिंदा हैं... लेकिन भोपाल की जनता के साथ एक बार फिर नाइंसाफ़ि हुई है... और दोषियों को 25 हज़ार के मुचलके पर उन्हें ज़मानत पर छोड़ दिया गया...
इस त्रासदी में 35 हज़ार से ज़्यादा लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी...ये दिन इतिहास के पन्नों पर अपनी स्याह छाप छोड़ चुका है... जिससे कोई चाह कर भी उभर नहीं सकता... दुनिया की सबसे बड़ी हैवानियत वाली कहानी 1984 की कहानी... जहां भागते-भागते लोग लाशों में तब्‍दील हो गए...लाशें ही लाशें पर दफनाने वाला कोई नहीं... 1984 में शहर में गैस के रिसाव से मचे मौत के तांडव से धीरे-धीरे लोग उभर रहे हैं लेकिन आज भी फैक्टरी में  मौत का सामान बाकी है... 19 जुलाई 1998 को कार्बाइड प्रबंधन भोपाल पास 67 एकड़ में फैक्टरी में फैले हुए 18 हजार मैट्रिक टन टाकसिक सिल्ट और केमिकल छोड़कर चला गया...

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